नई दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय नाट्य उत्सव के रूप में आयोजित हो रहे 17वें भारत रंग महोत्सव
के मौके पर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के प्राँगण की साज-सज्जा को देखते हुए
बामा अकादमी के निदेशक द्धय रामकुमार शर्मा तथा भारती शर्मा ने रंगमंच और
चित्रकला के गहरे अंतर्संबंधों को नजदीक से महसूस और रेखांकित किया । उल्लेखनीय है कि रंगमंच और चित्रकला के गहरे अंतर्संबंधों का एक बहुत लम्बा इतिहास है । दो-ढाई हजार वर्ष पहले भरत ने रंगमंच और दूसरी प्रदर्शनकारी कलाओं के आपसी रिश्ते पर अपने नाट्यशास्त्र में बार-बार चर्चा की है । जहाँ
एक ओर उन्होंने गायन, वादन, संगीत और नृत्य को रंगमंच में प्रमुखता प्रदान
की है, वहीं ललित कलाओं जैसे कि चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य को भी
बराबर का दर्जा दिया है । यह शायद आज तक भी निश्चित नहीं है कि मनुष्य
ने अपने आदिम विकास की अवस्था में पहले ध्वनि और संकेतों की भाषा सीखी अथवा
गुफाओं, चट्टानों, पत्थरों व धरती पर चित्र-भाषा की शुरुआत की । यह तो
स्पष्ट है कि यह दोनों ही माध्यम उसकी आदिम अभिव्यक्ति के बहुत ही जीवंत
विकल्प थे और दोनों एक दूसरे के साथ-साथ नहीं तो एक दूसरे के बाद अवश्य ही
अस्तित्व में आ चुके थे । इस तथ्य के साथ रंगमंच और चित्रकला के अंतर्संबंधों को पहचानने की कोशिश करें तो उसके बहुत से रूप एक साथ दिखाई पड़ते हैं ।
संस्कृत नाटकों के आलेखों का चित्रकला के साथ तो बहुत गहरा रिश्ता रहा ही
है, नल-दमयंती आख्यान में भी दमयंती के वियोग के दिनों में नल द्धारा उसका
चित्र बना कर ही उसे याद करने का प्रसंग है । ऐसे ही बहुत से उल्लेख आधुनिक
नाटकों में भी मिल जाते हैं । यह उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि
चाक्षुक माध्यम होने के कारण दोनों कलाओं के अंतर्संबंध बाकी कलाओं की
तुलना में बहुत ठोस और व्यावहारिक रहे हैं । नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के
प्राँगण में घूमते हुए राम कुमार शर्मा व भारती शर्मा ने दोनों कलाओं के
अंतर्संबंधों की एक झलक को नजदीक से देखते हुए खुद को रोमांचित पाया, जिसे
यहाँ इन तस्वीरों में भी पहचाना जा सकता है :